Indian Polity · Polity
मूल रूप से, यदि किसी विधि या संवैधानिक संशोधन को नौवीं अनुसूची में रख दिया जाए, तो इसका क्या परिणाम होता था?
- 1उसे एक विशेष समिति द्वारा अनुमोदित किया जाना आवश्यक था
- 2वह छह महीने के बाद स्वतः समाप्त हो जाता था
- 3उसे केवल राज्य सभा के अनुमोदन की आवश्यकता होती थी
- 4वह न्यायालय में न्यायिक समीक्षा के योग्य नहीं रह सकता था✓
सही उत्तर देखें
वह न्यायालय में न्यायिक समीक्षा के योग्य नहीं रह सकता था
व्याख्या
विस्तृत स्पष्टीकरण:
मूल रूप से, यदि किसी कानून या संवैधानिक संशोधन को भारतीय संविधान की नौवीं अनुसूची (Ninth Schedule) में डाल दिया जाता था, तो वह न्यायालय की न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के दायरे से बाहर हो जाता था यानी उसे अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती थी।
मुख्य बिंदु:
प्रथम संविधान संशोधन (1951): नौवीं अनुसूची को भारतीय संविधान में पहले संविधान संशोधन अधिनियम, 1951 द्वारा जोड़ा गया था ताकि भूमि सुधार कानूनों को न्यायिक समीक्षा से बचाया जा सके।
केशवानंद भारती मामला (1973): हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने 1973 के ऐतिहासिक फैसले में यह स्पष्ट किया कि नौवीं अनुसूची में शामिल कानूनों की भी न्यायिक समीक्षा की जा सकती है यदि वे संविधान के 'मूल ढांचा' (Basic Structure) का उल्लंघन करते हैं।
वर्तमान स्थिति: 24 अप्रैल 1973 के बाद नौवीं अनुसूची में शामिल किए गए किसी भी कानून की न्यायिक समीक्षा की जा सकती है यदि वह मौलिक अधिकारों या संविधान की मूल संरचना के विरुद्ध हो।
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