Indian Polity · Polity Science
भारत में जनहित याचिका (पीआईएल) के बारे में निम्नलिखित में से कौन सा कथन सही नहीं है?
- 1जनहित याचिका किसी भी नागरिक द्वारा सार्वजनिक हित के लिए दायर की जा सकती है।
- 2जनहित याचिका समाज के हाशिए पर स्थित वर्गों को न्याय तक पहुंच प्रदान करने के लिए शुरू की गई थी।
- 3जनहित याचिका कुछ परिस्थितियों में निजी पार्टियों के खिलाफ दायर की जा सकती है।
- 4सर्वोच्च न्यायालय सीधे तौर पर एक समाचार पत्र की रिपोर्ट के आधार पर किसी मामले का संज्ञान ले सकता है और उसे जनहित याचिका मान सकता है, केवल तभी जब रिपोर्ट मुख्य न्यायाधीश को ज्ञात किसी पत्रकार द्वारा दायर की गई हो।✓
सही उत्तर देखें
सर्वोच्च न्यायालय सीधे तौर पर एक समाचार पत्र की रिपोर्ट के आधार पर किसी मामले का संज्ञान ले सकता है और उसे जनहित याचिका मान सकता है, केवल तभी जब रिपोर्ट मुख्य न्यायाधीश को ज्ञात किसी पत्रकार द्वारा दायर की गई हो।
व्याख्या
मुख्य स्पष्टीकरण: भारत में जनहित याचिका (PIL
- Public Interest Litigation) की शुरुआत 1980 के दशक की शुरुआत में न्यायमूर्ति पी. एन. भगवती और न्यायमूर्ति कृष्णा अय्यर द्वारा की गई थी। इसके तहत अदालत के पारंपरिक 'लोकस स्टैंडी' (Locus Standi
- पीड़ित पक्ष द्वारा ही अदालत जाने का नियम) में ढील दी गई ताकि समाज के किसी भी जनहितैषी नागरिक या संस्था द्वारा जनहित में मामला उठाया जा सके।
कथन
- (C) असत्य क्यों है: सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय समाचार पत्र की रिपोर्ट, पत्र या डाक के माध्यम से भी स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लेकर जनहित याचिका स्वीकार कर सकते हैं। इसके लिए यह बिल्कुल भी आवश्यक नहीं है कि वह रिपोर्ट या पत्र मुख्य न्यायाधीश को व्यक्तिगत रूप से ज्ञात किसी पत्रकार द्वारा ही दायर किया गया हो।
अन्य कथन: कथन (A), (B), और
- (D) सत्य हैं क्योंकि PIL के जरिए हाशिए के लोगों को न्याय सुलभ कराया गया है, इसे कोई भी नागरिक सार्वजनिक हित में दायर कर सकता है, और कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में यह निजी निकायों या पार्टियों के खिलाफ भी विचारणीय हो सकती है यदि उनका कृत्य सार्वजनिक कर्तव्य से जुड़ा हो।
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