General Studies · Principles of Banking and Charges on Securities
बैंक-ग्राहक संबंधों और प्रतिभूतियों पर प्रभार निर्माण के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: कथन I: बैंकर के ग्रहणाधिकार (Lien) में, बैंक के पास देनदार के सामान और प्रतिभूतियों को तब तक बनाए रखने का अधिकार है जब तक कि ऋण समाप्त न हो जाए, और यह अधिकार विशिष्ट उद्देश्य (जैसे सुरक्षित अभिरक्षा) के लिए जमा की गई संपत्तियों तक विस्तृत है। कथन II: राइट ऑफ सेट-ऑफ एक बैंक को एक ही ग्राहक के दो या दो से अधिक खातों को संयोजित करने की अनुमति देता है ताकि एक खाते के डेबिट शेष को दूसरे खाते के क्रेडिट शेष के साथ समायोजित किया जा सके, बशर्ते खाते एक ही अधिकार और क्षमता में रखे गए हों। कथन III: भारतीय अनुबंध अधिनियम की धारा 171 के तहत सामान्य ग्रहणाधिकार बैंकर्स के लिए उपलब्ध है, जो उन्हें खाते के सामान्य शेष के लिए सुरक्षा के रूप में उनके पास जमानत के रूप में रखे गए किसी भी सामान को बनाए रखने की अनुमति देता है। कथन IV: क्लेटन के मामले का नियम कैश क्रेडिट जैसे चालू खातों पर लागू होता है, जहाँ क्रेडिट पक्ष की पहली वस्तु को कालानुक्रमिक क्रम में डेबिट पक्ष की पहली वस्तु को चुकाने के लिए लागू किया जाता है। कथन V: जब बैंक गिरवी (Pledge) द्वारा प्रभार बनाता है, तो माल का स्वामित्व बैंक को हस्तांतरित हो जाता है, जबकि कब्जा व्यापार के उद्देश्य से उधारकर्ता के पास रहता है। उपर्युक्त कथनों में से कौन से सही हैं?
- 1सभी कथन सही हैं।
- 2केवल IV और V
- 3केवल II, III, और IV✓
- 4केवल I, II
सही उत्तर देखें
केवल II, III, और IV
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