Economics · New Industrial Policy 1991
1991 से पहले भारत में निजी क्षेत्र की फर्मों द्वारा ऋण समझौतों में अनिवार्य परिवर्तनीयता खंड की भारी आलोचना और डर क्यों था?
- 1इसके तहत कंपनियों को विशेष रूप से संस्थागत निवेशकों को उच्च कॉर्पोरेट लाभांश का भुगतान करना पड़ता था
- 2इसने फर्मों को अंतर्राष्ट्रीय बाजारों या बाहरी वाणिज्यिक उधारों के माध्यम से पूंजी जुटाने से रोक दिया
- 3इसके कारण अल्पकालिक कॉर्पोरेट पूंजी पर नाममात्र की ब्याज दरों में भारी वृद्धि हुई
- 4इसे वित्तीय संस्थानों द्वारा पिछले दरवाजे से अधिग्रहण (टेकओवर) के एक अनुचित खतरे के रूप में देखा जाता था✓
सही उत्तर देखें
इसे वित्तीय संस्थानों द्वारा पिछले दरवाजे से अधिग्रहण (टेकओवर) के एक अनुचित खतरे के रूप में देखा जाता था
व्याख्या
विस्तृत स्पष्टीकरण:
निजी क्षेत्र के उद्यमी और कंपनियाँ 1991 से पहले ऋण समझौतों में अनिवार्य परिवर्तनीयता खंड (Convertibility Clause) का कड़ा विरोध करती थीं और इसे लेकर उनमें हमेशा भय का माहौल रहता था।
पिछले दरवाजे से अधिग्रहण का डर: निजी प्रमोटरों को यह डर रहता था कि यदि उनकी कंपनी अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाई या संस्थान चाहें, तो वे अपने ऋण को इक्विटी में बदलकर कंपनी में भारी हिस्सेदारी हासिल कर सकते हैं।
प्रमोटर नियंत्रण पर खतरा: इसे सरकार या वित्तीय संस्थानों द्वारा 'पिछले दरवाजे से टेकओवर' (Backdoor Takeover) यानी कंपनियों के निजी प्रबंधन पर नियंत्रण हथियाने के एक अनुचित साधन के रूप में देखा जाता था। यही कारण है कि उद्योग जगत इस खंड को अपनी स्वतंत्रता के लिए एक बड़े खतरे के रूप में देखता था।
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